dungar Dev
आदिवासियों की आस्था किसी कैलेंडर की तारीखों से नहीं, बल्कि प्रकृति के ऋतुचक्र से जुड़ी रही है। 🌳
जंगल, पहाड़, नदियां, सूर्य, चंद्रमा, बारिश, धरती और अनाज... यही आदिवासी जीवन की मूल रचना हैं। आदिवासी समाज ने प्रकृति के इन्हीं तत्वों में अपनी आस्था और जीवन का आधार खोजा है।
दिवाली के आसपास भारत के अलग-अलग आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक ऋतु और कृषि परंपराओं के अनुसार उत्सव मनाते हैं। कहीं सोहराय, कहीं नवाखानी, कहीं नवाखाई, कहीं वांगला, कहीं चवांग कुट और कहीं तोखू एमोंग जैसे उत्सव मनाए जाते हैं।
वहीं दक्षिण गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य भारत के कई आदिवासी अंचलों में इस समय डूंगर देव की पूजा की परंपरा भी देखने को मिलती है।
जब डूंगर फूलों और हरियाली से खिल उठते हैं, तब उन पहाड़ों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय आता है। डूंगर के नाम पर पूजा, पारंपरिक अर्पण और दारू की धार चढ़ाने की परंपरा हमारी प्रकृति-केंद्रित आस्था का हिस्सा है।
आज जरूरत है कि हम अपनी परंपराओं को केवल त्योहार समझकर न मनाएं, बल्कि उनके पीछे छिपे आदिवासी जीवन-दर्शन को भी समझें।
क्योंकि हमारे लिए पहाड़ केवल पत्थर नहीं, जंगल केवल लकड़ी नहीं और नदियां केवल पानी नहीं हैं। ये हमारे जीवन, अस्तित्व और संस्कृति का आधार हैं।
जोहार #adivasi
Where is it happening?
Event Location & Nearby Stays:














