गीतामृत 2/55
*गीता अध्याय 2/55*
@gitasatsang
#drhbpandey
डां.हरिवंश पाण्डेय
*****************
*श्रीभगवानुवाच*
*प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।*
*श्रीभगवान् उवाच* (श्रीभगवान ने कहा) *पार्थ सर्वान् मनोगतान् कामान्* हे पार्थ! (जब) मन मे आई हुई सभी कामनाओं को
*प्रजहाति* त्याग देता है, *आत्मनि एव आत्मना*
स्वयं मे ही,स्वयं के द्वारा
*तुष्टः* संतुष्ट रहता है,
*तदा स्थितप्रज्ञः उच्यते* तब वे स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं।
*श्रीभगवान् ने कहा- हे पार्थ ! जब वे मनकी समस्त कामना का परित्याग कर देते हैं और निग्रह किये हुए मनमें ही आनन्दस्वरूप आत्म तुष्ट होते हैं, तब वे स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं*
*मनन-चिंतन*
स्थितप्रज्ञ साधक का पहला गुण है - *कामना त्याग*
क्या भाव है?
कामना से क्या समझा जाय?
कामना ईश प्राप्ति की है,तो इसे छोड़ दें?
संसार मे कोई है,क्या वह उच्च पद की लालसा छोड़ दे?
नहीं।भगवान वैसी कामना को छोड़ने की बात कह रहे हैं जो प्रेय मार्ग की तरफ व्यक्ति को ले जाती है।वैसी कामनाओं को छोड़ने की कह रहे है जो व्यक्ति को अवनति के पथ पर ले जाती हैं। ऐसी कामाना Lustकहलाती है।
3/43 मे भी ऐसी ही कामना को मार डालने का उपदेश है-
*एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।* 3./43।।
अगर अध्यात्म मे हैं तो जागतिक बस्तुओ से मन को दूर हटाये ,राग कम करते जाय।
अगर संसार मे है,तो लक्ष्य से भटकाने वाली कामाना को छोड़िये।
अर्जुन युद्ध क्षेत्र मे है,तो उसे युद्ध से बिरत ले जाने वाली कामना जैसे बन मे जाना,भिक्षा मागना आदि को छोड़ने की सलाह है।बुद्धि को स्थिर रखे सिर्फ लक्ष्य को ही देखे।
भागवत 7/10/9 मे भी ऐसी प्रेय मार्ग पर ले जाने वाली कामना छोड़ने की बात कही है-
*विमुंचति यदा कामान् मानवो मनसि स्थितान्।तर्ह्येव पुंडरीकाक्ष भगवत्वाय कल्पते।।*
भाव है भगवत् प्राप्ति चाहते हो तो मन मे जगत् की चाह को छोड़ दो।
@gitasatsang
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डां.हरिवंश पाण्डेय
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*श्रीभगवानुवाच*
*प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।*
*श्रीभगवान् उवाच* (श्रीभगवान ने कहा) *पार्थ सर्वान् मनोगतान् कामान्* हे पार्थ! (जब) मन मे आई हुई सभी कामनाओं को
*प्रजहाति* त्याग देता है, *आत्मनि एव आत्मना*
स्वयं मे ही,स्वयं के द्वारा
*तुष्टः* संतुष्ट रहता है,
*तदा स्थितप्रज्ञः उच्यते* तब वे स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं।
*श्रीभगवान् ने कहा- हे पार्थ ! जब वे मनकी समस्त कामना का परित्याग कर देते हैं और निग्रह किये हुए मनमें ही आनन्दस्वरूप आत्म तुष्ट होते हैं, तब वे स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं*
*मनन-चिंतन*
स्थितप्रज्ञ साधक का पहला गुण है - *कामना त्याग*
क्या भाव है?
कामना से क्या समझा जाय?
कामना ईश प्राप्ति की है,तो इसे छोड़ दें?
संसार मे कोई है,क्या वह उच्च पद की लालसा छोड़ दे?
नहीं।भगवान वैसी कामना को छोड़ने की बात कह रहे हैं जो प्रेय मार्ग की तरफ व्यक्ति को ले जाती है।वैसी कामनाओं को छोड़ने की कह रहे है जो व्यक्ति को अवनति के पथ पर ले जाती हैं। ऐसी कामाना Lustकहलाती है।
3/43 मे भी ऐसी ही कामना को मार डालने का उपदेश है-
*एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।* 3./43।।
अगर अध्यात्म मे हैं तो जागतिक बस्तुओ से मन को दूर हटाये ,राग कम करते जाय।
अगर संसार मे है,तो लक्ष्य से भटकाने वाली कामाना को छोड़िये।
अर्जुन युद्ध क्षेत्र मे है,तो उसे युद्ध से बिरत ले जाने वाली कामना जैसे बन मे जाना,भिक्षा मागना आदि को छोड़ने की सलाह है।बुद्धि को स्थिर रखे सिर्फ लक्ष्य को ही देखे।
भागवत 7/10/9 मे भी ऐसी प्रेय मार्ग पर ले जाने वाली कामना छोड़ने की बात कही है-
*विमुंचति यदा कामान् मानवो मनसि स्थितान्।तर्ह्येव पुंडरीकाक्ष भगवत्वाय कल्पते।।*
भाव है भगवत् प्राप्ति चाहते हो तो मन मे जगत् की चाह को छोड़ दो।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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Host or Publisherसत्संग






